साहित्य का मूल तत्व स्वच्छंदता : प्रो. आनन्द कुमार त्यागी

हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की ओर से हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

वाराणसी। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की ओर से हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित ‘भाषा, साहित्य, समाज और राजनीति पर वैश्विक चिंतन का प्रभाव’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ सोमवार को हुआ। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने ‘साहित्य, समाज व विभाजन’ पर वक्तव्य देते हुए कहा कि साहित्य का मूल तत्व ‘स्वच्छंदता’ है, जिसे बाह्य प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने जर्मनी व चेकोस्लोवाकिया के साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजनकारी ऐतिहासिक संदर्भों की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि साहित्य का अंतिम ध्येय स्वतंत्रता, समता और न्याय की स्थापना होना चाहिए। मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. अजमेरी सिंह काजल ने कहा कि साहित्य और भाषा मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण तथा समाज के सर्वांगीण विकास के सशक्त माध्यम हैं। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने नागरी लिपि और हिन्दी के वैश्विक विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा और साहित्य की प्रगति में लिपि की भूमिका आधारभूत होती है; अतः भाषा के संरक्षण हेतु नागरी लिपि का संवर्धन अनिवार्य है। साथ ही, हिन्दी के संवैधानिक इतिहास और राजभाषा बनने की यात्रा को रेखांकित किया गया।

संगोष्ठी में प्रो. कालीचरण स्नेही, पूर्व विभागाध्यक्ष, लखनऊ विश्वविद्यालय ने हिन्दी में मौलिक ‘ज्ञान उत्पादन’ की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. जावेद खोलोव, तजाकिस्तान ने ‘मध्य एशिया में भारतीय भाषा विमर्श’ विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय भाषा और संस्कृति में संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में पिरोने का सामर्थ्य है। प्रो. अनुसूया साहू, सिंगापुर ने कहा कि हिन्दी को केवल औपचारिक आयोजनों और भाषणों तक सीमित न रखकर जन-जन, परिवार और दैनिक बोलचाल की व्यावहारिक भाषा बनाना समय की मांग है। प्रो. विपिन कुमार, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने कहा कि वैश्विक चिंतन के दौर में किसान और आदिवासी समाज सर्वाधिक उपेक्षित रहे हैं। प्रो. सुशीला टाकभौरे ने कहा कि साहित्य समाज का सजीव दर्शन है। रूपनारायण सोनकर ने हिन्दी भाषा के व्यापक सामाजिक प्रभाव, वर्तमान चुनौतियों और उसके वैश्विक विस्तार पर विस्तार से प्रकाश डाला।

संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्टिंग विश्वकर्मा भारती ने प्रस्तुत की। संचालन डॉ. राजमणि सरोज एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिव शंकर यादव ने किया। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. राजमुनि, सह-संयोजक प्रो. रामाश्रय सिंह, प्रो. निरंजन कुमार सहाय, प्रो. अनुकूलचंद राय, डॉ. अविनाश कुमार सिंह, डॉ. विजय कुमार रंजन, डॉ. सुरेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. प्रीति, जनमेजय, अंजना भारती, हनुमान, हेमलता, आकाश सिंह, धर्मेंद्र, आशीष मिश्रा, विश्वकर्मा भारती, बिन्दा यादव, सोनाली रावत, प्रीति कुमारी आदि उपस्थित रहीं।

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