हिंदी भाषी प्रदेशों में सुहाग और सौभाग्य की रक्षा के लिए मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व हरितालिका तीज आज श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। शिव की नगरी काशी में सुहागिन महिलाओं ने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निर्जला व्रत रखा। सुबह महिलाओं ने दुर्गा घाट स्थित मंगला गौरी मंदिर में दर्शन-पूजन किया, जबकि शाम को शिवालयों में पहुंचकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना कर हरितालिका तीज की कथा सुनी।
हरितालिका तीज के अवसर पर काशी में सुबह से ही मंदिरों में महिलाओं की भीड़ देखने को मिली। सुहागिनों ने पूरे दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किए व्रत रखा और भगवान शिव तथा माता पार्वती से अपने पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को कठोर तपस्या करते हुए यह व्रत किया था। माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी मान्यता के चलते हरितालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के साथ कुंवारी कन्याओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है।
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घर छोड़कर कठोर तपस्या की थी। उन्होंने भगवान शिव की आराधना करते हुए भाद्रपद शुक्ल तृतीया को व्रत रखा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए। माता पार्वती ने महादेव को पति रूप में स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त की, जिस पर भगवान शिव ने उन्हें तथास्तु कहा।
कथा में बताया गया है कि माता पार्वती ने अपने पिता गिरिराज हिमालय से भी स्पष्ट कहा कि उन्होंने महादेव को ही अपने आराध्य और पति के रूप में चुना है। उनकी इच्छा को स्वीकार करते हुए गिरिराज ने उनका विवाह भगवान शिव से कराया। इसी कारण हरितालिका तीज को मनचाहा जीवनसाथी पाने और अखंड सौभाग्य का पर्व माना जाता है।
दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को महिलाएं शिवालयों में पहुंचीं। यहां मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने शिव-पार्वती को फल, फूल, वस्त्र और श्रृंगार सामग्री अर्पित की और इसके बाद हरितालिका तीज की कथा सुनी।
काशी में इस पर्व को लेकर महिलाओं में खास उत्साह देखने को मिला। हाथों में मेहंदी, सोलह श्रृंगार और पारंपरिक परिधान में महिलाएं शिव-पार्वती की आराधना करती नजर आईं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और निष्ठा से करने वाली महिलाओं को अखंड सौभाग्य तथा कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित जीवनसाथी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
