
रामनगर। विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में छठे दिन का प्रसंग श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों से सराबोर रहा। सीता स्वयंवर के बाद अयोध्या से जनकपुर के लिए श्रीराम की बारात प्रस्थान करती है। इस दौरान रामलीला क्षेत्र में कहीं लोग बाराती तो कहीं घराती की भूमिका में नजर आए। घोड़े, रथ और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निकली श्रीराम की बारात ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
लीला की शुरुआत अयोध्या से हुई। जनक जी के दूत के रूप में बच्चन गुरुजी ने महाराजा दशरथ को विवाह की पत्रिका पहुंचाई। पत्रिका में धनुष भंग, भगवान परशुराम और श्रीराम के संवाद सहित विवाह का निमंत्रण दिया गया था। जनक दूत के पात्र में बच्चन गुरुजी ने भावपूर्ण संवाद प्रस्तुत कर लीला प्रेमियों को भावविभोर कर दिया।
महाराजा दशरथ ने विवाह की पत्रिका पढ़कर प्रसन्नता व्यक्त की और जनक दूत से पूछा कि महाराज जनक ने उनके पुत्रों को कैसे पहचान लिया। इसके जवाब में जनक दूत ने श्रीराम और लक्ष्मण के तेज और पराक्रम का वर्णन करते हुए कहा कि दोनों बालकों को देखने के बाद दृष्टि में कोई और ठहरता ही नहीं। तुलसीदास जी की रचनाओं से लिए गए पदों और चौपाइयों के माध्यम से इस प्रसंग को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद महाराजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ और अयोध्या की माताओं के समक्ष विवाह पत्रिका का वाचन किया। भरत और शत्रुघ्न सहित अयोध्यावासी श्रीराम की बारात लेकर जनकपुर के लिए रवाना हुए। जनकपुर पहुंचने पर बारात का भव्य स्वागत किया गया और सभी बाराती जनवासे में ठहरे।
जनकपुर में चारों भाइयों के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। सखियां और जनकपुरवासी श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूप की चर्चा करते नजर आए। जब चारों भाई दूल्हे के वेश में मंडप की ओर पहुंचे तो उनकी अद्भुत झांकी देखने के लिए देवताओं, महादेव, ब्रह्माजी और यक्षों के आने का प्रसंग भी लीला में प्रस्तुत किया गया।
तुलसीदास जी की चौपाइयों के माध्यम से विवाह के इस दिव्य प्रसंग का वर्णन किया गया। देवताओं ने श्रीसीताराम के दूल्हा स्वरूप का गुणगान किया। इसके बाद द्वारपूजा का प्रसंग हुआ, जिसमें महारानी सुनैना ने चारों भाइयों का परछन और आरती की। रामनगर की पारंपरिक लीला में मुसर-लोढ़ा से परछन तथा महिलाओं द्वारा लोकगीत गाने की परंपरा भी निभाई गई।
इसके बाद मंडप में गुरु वशिष्ठ और शतानंद जी के विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच विवाह संपन्न हुआ। जनक जी ने कन्यादान कर स्वयं को धन्य माना। रामनगर रामलीला की विशेषता के अनुरूप विवाह का पूरा प्रसंग पारंपरिक वैदिक विधि-विधान के साथ प्रस्तुत किया गया।
छठे दिन की आरती भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इस दौरान आठों स्वरूप एक साथ विराजमान रहे। भगवान श्रीराम-सीता, भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति के स्वरूपों की आरती की गई। महारानी सुनैना ने आरती उतारी। इस दौरान पूरा लीला क्षेत्र जय श्रीराम के जयघोष और भक्ति भाव से गूंज उठा।
