रामनगर रामलीला के बारहवें दिन भरत-राम मिलन का भावपूर्ण प्रसंग

रामनगर। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला के बारहवें दिन की लीला का आरंभ भरद्वाज मुनि के आश्रम से हुआ। भरत जी ने मुनि भरद्वाज से चित्रकूट जाने की आज्ञा ली। इसी बीच स्वर्गलोक में हलचल मच गई। इंद्र को चिंता हुई कि यदि भरत और राम का मिलन हो गया तो उनकी योजना बिगड़ सकती है। देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र को समझाया कि भगवान के भक्त के साथ कपट करना भारी पड़ सकता है। उन्होंने भरत जी की महिमा बताते हुए इंद्र को सावधान किया।

इसके बाद सभी अयोध्यावासी यमुना पार कर चित्रकूट की ओर बढ़े। मार्ग में कोल-भीलों ने भरत और शत्रुघ्न को देखा तो उन्हें राम-लक्ष्मण की छवि दिखाई दी। सेना देखकर जब उन्हें भ्रम हुआ तो बताया गया कि भरत अपने बड़े भाई राम को वन से वापस अयोध्या ले जाने के लिए जा रहे हैं। ग्रामीणों ने माता-पिता द्वारा ऐसे पुत्रों को वन भेजे जाने पर दुख जताया और भरत के दर्शन को अपना सौभाग्य बताया।

उधर चित्रकूट में एक कोल ने राम जी को सूचना दी कि भरत सेना के साथ उनकी ओर आ रहे हैं। यह सुनकर लक्ष्मण जी क्रोधित हो उठे और उन्होंने आशंका जताई कि भरत राज्य के लोभ में राम को नुकसान पहुंचाने आए हैं। तभी आकाशवाणी हुई कि बिना विचार किए कोई कार्य नहीं करना चाहिए। भगवान राम ने भी लक्ष्मण को समझाया कि भरत के मन में राज्य का लोभ हो ही नहीं सकता।

निषादराज ने भरत को राम की कुटिया दिखाई। जब भरत जी ने राम को प्रणाम किया तो राम और लक्ष्मण सब कुछ भूलकर उनकी ओर दौड़ पड़े। दोनों भाइयों का भावपूर्ण मिलन हुआ। भगवान राम ने सभी से प्रेमपूर्वक भेंट की और अपनी माताओं से भी मिले।

प्रेम के आगे मिट जाती हैं सभी सीमाएं

आज की लीला में गुरु वशिष्ठ और निषादराज का प्रसंग भी विशेष रूप से भावपूर्ण रहा। रामनगर की लीला में इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश उभरकर सामने आया कि भगवान के प्रेम में जाति, कुल और सामाजिक भेद की कोई सीमा नहीं होती।

रामचरितमानस की चौपाई इस भाव को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है—

“प्रेम पुलकि केवट कहि नामू।
कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
राम सखा रिषि बरबस भेंटा।
जनु महि लुठत सनेह समेटा॥”

अर्थात प्रेम से पुलकित निषादराज ने अपना नाम बताते हुए दूर से ही दंडवत प्रणाम किया। ऋषि वशिष्ठ ने उसे राम का सखा जानकर प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया। मानो धरती पर बिखरे प्रेम को समेट लिया हो।

इस प्रसंग का भाव यही है कि जिसे भगवान ने अपना मान लिया, वह जाति, कुल, ज्ञान-अज्ञान जैसी सीमाओं से ऊपर उठ जाता है। जिसके हृदय में प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम है, वह परम पवित्र है।

इसके बाद सभी लोग आश्रम पहुंचे। वहां राम जी को पिता दशरथ के निधन का समाचार मिला, जिसे सुनकर वे अत्यंत व्यथित हुए। इसके बाद मंदाकिनी नदी में तर्पण किया गया और सभी ने स्नान किया। कोल-भीलों और अयोध्यावासियों के बीच हुए सुंदर संवाद ने लीला को और भावपूर्ण बना दिया।

इसी के साथ बारहवें दिन की रामलीला का विश्राम हुआ। आज की आरती निषादराज जी ने की।

TOP

You cannot copy content of this page