पीएम के लिए अपशब्दों के इस्तेमाल पर आनंदी बेन ने जतायी नाराजगी

ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए, जिसमें संस्कार नहीं -राज्यपाल

संस्कृत वि वि के 44वें दीक्षांत समारोह में राष्ट्र निर्माण में योगदान का दिलाया संकल्प

वाराणसी (काशीवार्ता)। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के 44वें दीक्षान्त समारोह को संबोधित करते हुए प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा, शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी है। उन्होंने उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों से अपने ज्ञान और क्षमताओं का उपयोग समाज व राष्ट्र के विकास में करने का आह्वान किया।

राज्यपाल ने कहा, संस्कृत भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की आधारभूत भाषा है। इसके ग्रंथों में ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, पर्यावरण, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से संबंधित व्यापक ज्ञान का भंडार है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। विद्यार्थियों को शिक्षा को केवल रोजगार तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरों के लिए भी अवसर पैदा करने चाहिए। नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा और स्थानीय संस्कृति को विशेष महत्व दिया गया है। संस्कृत विश्वविद्यालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विश्वविद्यालयों को शोध और नवाचार को बढ़ावा देने के साथ विद्यार्थियों को सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रेरित करना चाहिए। राज्यपाल ने महिलाओं और बेटियों की शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए कहा, शिक्षित व संस्कारित बेटियां परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जल संरक्षण और सामाजिक सेवा में विद्यार्थियों से सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।

राज्यपाल ने कुलपति के कार्यों की सराहना करते हुए कहा, विश्वविद्यालय में पाण्डुलिपियों के संरक्षण का कार्य तेजी से चल रहा है। यह गौरव का विषय है कि अब तक देश में 52 लाख से अधिक पाण्डुलिपियों का दस्तावेजीकरण हो चुका है। उन्होंने हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं की भाषा के संदर्भ में चिंता जताते हुए कहा, ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री के प्रति भी असम्मानजनक भाषा का प्रयोग हो। एक दिन में 20 घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री के लिए ग़लत भाषा का इस्तेमाल बेहद कष्टदायक है। इससे पूर्व राज्यपाल ने विभिन्न संकायों के मेधावी विद्यार्थियों को पदक एवं उपाधियां प्रदान किया। समारोह के अंत में उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों ने अपने ज्ञान और क्षमताओं का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करने का संकल्प लिया।

ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह विनम्रता का आधार बने : प्रो. शर्मा

समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. आशुतोष शर्मा ने कहा, काशी केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की सनातन ज्ञान-चेतना का जीवंत प्रतीक है। यहां शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक उत्कृष्टता नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और मानवता का कल्याण रहा है। विश्वविद्यालय इस परम्परा का सशक्त संवाहक है। कहा, सरस्वती भवन में सुरक्षित अमूल्य पाण्डुलिपियां भारत की समृद्ध ज्ञान-संपदा की परिचायक हैं। दीक्षान्त समारोह केवल उपाधि वितरण का अवसर नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व ग्रहण करने का पावन क्षण है। भारतीय परम्परा में दीक्षा का अर्थ ज्ञानार्जन के साथ जीवन को लोकमंगल के लिए समर्पित करना है। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह विनम्रता, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का आधार बने।

कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा, विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परम्परा का प्रमुख केन्द्र है। यहां वैदिक साहित्य, दर्शन और पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान व भाषा-विज्ञान का समन्वय किया जा रहा है। विद्यार्थियों को रोजगारपरक शिक्षा देने के लिए शिक्षाशास्त्र, पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान, पुरातत्व, संग्रहालय विज्ञान तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार जैसे पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। यहाँ जर्मन, रूसी, फ्रेंच और स्पेनिश भाषाओं में डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं।

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