उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हर वर्ष ज्येष्ठ माह में प्रसिद्ध ‘गाजी मियां का मेला’ आयोजित किया जाता है। स्थानीय लोग इसे प्यार से ‘गुड्डी-गुड्डी लड़ैया’ के मेले के नाम से भी जानते हैं। यह मेला मुख्य रूप से जैतपुरा, बेनियाबाग और आसपास के इलाकों में लगता है तथा बनारस की सबसे प्राचीन लोक परंपराओं में गिना जाता है।
इस मेले की सबसे खास और अनोखी परंपरा ‘गाजी मियां की बारात’ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, 11वीं सदी के सैय्यद सालार मसूद गाजी की शादी की इच्छा अधूरी रह गई थी। इसी अधूरी हसरत की याद में बनारस में हर साल प्रतीकात्मक रूप से उनकी बारात निकाली जाती है।
मेले की तैयारियां सवा महीने पहले से शुरू हो जाती हैं। हल्दी, लग्न और अन्य रस्मों के बाद बारात सजाई जाती है। बाराती नए कपड़े पहनते हैं, आंखों में सुरमा लगाते हैं और पूरे उत्साह के साथ नाचते-गाते हुए तय आस्ताने या दरगाह की ओर बढ़ते हैं।
जब बारात अपने निर्धारित स्थान पर पहुंचती है, तब वहां विवाह की रस्में पूरी नहीं होतीं, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। यही परंपरा इस मेले को सबसे अलग और खास बनाती है। सदियों पुरानी यह अनूठी रस्म आज भी वाराणसी की गंगा-जमुनी तहजीब और लोक संस्कृति की जीवंत पहचान बनी हुई है।
