
वाराणसी (काशीवार्ता)। गरीब और जरूरतमंद मरीजों को बेहतर एवं सस्ती चिकित्सा सुविधा देने के उद्देश्य से सरकारी अस्पताल संचालित किए जाते हैं, लेकिन दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल (DDU) के मुख्य गेट के बाहर रात होते ही कथित तौर पर तस्वीर बदल जाती है। अस्पताल के गेट पर अंधेरे की आड़ में दवाओं की बिक्री और मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं व इंजेक्शन खरीदने के लिए भेजे जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
बताया जा रहा है कि रात के समय इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने वाले मरीज और उनके तीमारदार जब बीमारी और परेशानी से जूझ रहे होते हैं, उसी दौरान उन्हें कई बार अस्पताल के बाहर से दवा या इंजेक्शन खरीदने के लिए भेजा जाता है। आरोप है कि इनमें कुछ दवाएं और इंजेक्शन महंगे दामों पर खरीदने पड़ते हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
सूत्रों का दावा है कि रात के अंधेरे में अस्पताल के मुख्य गेट के आसपास दवा बिक्री की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। इतना ही नहीं, अस्पताल के गेट के आसपास कथित रूप से लोगों का जमावड़ा भी लगा रहता है। सवाल यह है कि यदि अस्पताल के मुख्य गेट के पास इस तरह दवाओं की बिक्री हो रही है तो जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ रही?
हैरानी की बात यह भी है कि अस्पताल के मुख्य गेट के पास ही पुलिस चौकी मौजूद है। इसके बावजूद यदि दवा बिक्री की गतिविधियां चल रही हैं तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकारी अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले गरीब मरीजों को यदि बाहर से महंगी दवाएं और इंजेक्शन खरीदने पड़ें तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के उद्देश्य पर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे में जरूरत है कि रात के समय अस्पताल गेट के आसपास होने वाली कथित दवा बिक्री और बाहर से महंगी दवाएं लिखे जाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
अब बड़ा सवाल यही है कि अंधेरे में सजने वाली इस कथित ‘रात की दवा दुकान’ के पीछे आखिर किसका संरक्षण है? मरीजों को बाहर से दवा खरीदने के लिए मजबूर करने की शिकायतों में कितनी सच्चाई है और गरीब मरीजों की जेब पर पड़ रहे अतिरिक्त बोझ का जिम्मेदार कौन है?
