महाशिवरात्रि पर राजसी स्वरूप में निकलेगी काशीपुराधिश्वर की शिव-बारात, गौरा को लाने की निभेगी परंपरा

वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सदियों पुरानी आस्था, लोकसंस्कृति और परंपराओं का जीवंत उत्सव है। इस वर्ष भी महाशिवरात्रि के अवसर पर काशीपुराधिश्वर महादेव माता गौरा को लाने के लिए राजसी स्वरूप में प्रतीकात्मक शिव-बारात के साथ नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इस दौरान बाबा सिंहासन पर विराजमान रहेंगे और उनके ऊपर नवरत्नों व सिगोंल से सुसज्जित छत्र रहेगा, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनेगा।

काशी की परंपरा के अनुसार बाबा विश्वनाथ वर्ष में चार बार चल स्वरूप में नगर भ्रमण करते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि का भ्रमण सबसे अलग माना जाता है। इस दिन बाबा अकेले दूल्हे के स्वरूप में निकलते हैं, जबकि अन्य अवसरों जैसे सावन पूर्णिमा, अन्नकूट और रंगभरी एकादशी पर माता गौरा और प्रथमेश के साथ सपरिवार दर्शन देते हैं। महाशिवरात्रि का यह स्वरूप शिव-विवाह की पूर्व संध्या का प्रतीक माना जाता है।

शिवांजली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र के अनुसार इस बार बाबा 11 प्रकार की काष्ठ से बने विशेष सिंहासन पर विराजमान होंगे, जिसे नवग्रहों का प्रतीक माना जाता है। वहीं नवरत्नों से सुसज्जित छत्र का निर्माण डमरू सेवा समिति से जुड़े श्रद्धालुओं द्वारा कराया गया है।

काशी की शिव-बारात अपनी अनूठी परंपरा के लिए जानी जाती है। इसमें अडभंगी भक्त, नागा साधु, वैरागी और शिवगण शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़े, डमरू और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

महंत वाचस्पति तिवारी के अनुसार महाशिवरात्रि का उत्सव पूरे नगर की लोकचेतना से जुड़ा है। घरों में दीप प्रज्ज्वलन, व्रत-पूजन और बारात स्वागत की परंपरा निभाई जाती है। महाशिवरात्रि को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह है और देश-विदेश से भक्त काशी पहुंच रहे हैं। तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं।

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