
वाराणसी (काशीवार्ता)।
बड़ागांव ब्लॉक के छोटे से गांव पतेर से निकलकर सहकारिता, राजनीति और पत्रकारिता तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले बाबू भूलन सिंह आज भी एक मिसाल माने जाते हैं। उनकी बेबाकी, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ने उन्हें वह मुकाम दिलाया, जहां बड़े-बड़े नेता और प्रभावशाली लोग भी उनके विचारों को गंभीरता से सुनते थे।
साधारण धोती-कुर्ता में जीवन जीने वाले बाबू साहब ने कभी समझौते की राह नहीं अपनाई। अक्खड़ मिजाज और साफ सोच उनकी पहचान थी। सहकारिता जगत में उन्होंने देश स्तर तक प्रभाव छोड़ा, वहीं पूर्वांचल की राजनीति में उनकी मौजूदगी के बिना मानो कुछ भी अधूरा माना जाता था। यही कारण था कि वे जितने दृढ़ थे, उतने ही लोगों के प्रिय भी थे।
राजनीति में उनका झुकाव कांग्रेस की ओर रहा, लेकिन दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हर विचारधारा के नेता उनका सम्मान करते थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, नारायण दत्त तिवारी, कल्पनाथ राय से लेकर वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित कई दिग्गज उनके साथ बैठकर समसामयिक राजनीति पर चर्चा करना गौरव समझते थे। औरंगाबाद हाउस से लेकर दिल्ली तक उनकी साफगोई और राजनीतिक समझ की चर्चा होती थी।
पढ़ाई भले औपचारिक रूप से सीमित रही हो, लेकिन समाज को समझने और दिशा देने की उनकी क्षमता असाधारण थी। यही वजह रही कि उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी नई राह बनाई। वर्ष 1991 में उन्होंने ‘काशीवार्ता’ के प्रकाशन की शुरुआत की, ताकि काशी और पूर्वांचल की आवाज को मजबूती से सामने लाया जा सके। आधुनिक तकनीक को अपनाने में वे हमेशा आगे रहे और बिना भविष्य की चिंता किए अपने सपनों को जमीन पर उतारा।
दुर्भाग्यवश वर्ष 1993 में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। इसके बाद अखबार की जिम्मेदारी उनके पौत्र सुशील सिंह और सुनील सिंह ने संभाली। दोनों ने अपने दादा के सपनों को आगे बढ़ाया और आज ‘काशीवार्ता’ न केवल वाराणसी बल्कि पूरे पूर्वांचल का एक अग्रणी सांध्य हिन्दी दैनिक बन चुका है।
एक साधारण परिवार से निकलकर सहकारिता और मीडिया के क्षेत्र में ऊंचाइयों तक पहुंचना बाबू भूलन सिंह की कर्मठता का प्रमाण है। उनकी 32वीं पुण्यतिथि पर यह कहना गलत नहीं होगा कि वे आज भी अपने विचारों, कार्यों और प्रेरणा से लोगों के बीच जीवित हैं। ऐसी महान शख्सियत को शत्-शत् नमन।
