नौ गौरी–नौ दुर्गा मंत्रों से अभिमंत्रित हल्दी से सजेगा गौरा का गौना, 27 को रंगभरी एकादशी पर निकलेगी भव्य पालकी यात्रा

वाराणसी। महाशिवरात्रि के पावन पर्व के बाद काशी में शिव-विवाह की परंपराओं का अगला महत्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ होने जा रहा है। रंगभरी एकादशी के अवसर पर निकलने वाली बाबा विश्वनाथ की ऐतिहासिक पालकी यात्रा से पहले माता गौरा के गौने की रस्में 24 फरवरी से विधिवत शुरू होंगी। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास “गौरा-सदनिका” में आयोजित पत्रकार वार्ता में महंत पं. वाचस्पति तिवारी ने विस्तृत कार्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि काशी की परंपरा के अनुरूप इस वर्ष भी नौ गौरी और नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित पावन हल्दी माता गौरा को अर्पित की जाएगी।

24 फरवरी की संध्या 6:45 बजे तेल-हल्दी की रस्म के साथ मांगलिक कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। इससे पूर्व काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में विशेष अनुष्ठान कर हल्दी को विधिवत पूजित किया जाएगा। 11 वैदिक ब्राह्मण वेद मंत्रों के साथ पूजन संपन्न करेंगे। शंखध्वनि और घंटानाद के बीच मंडप में विराजमान गौरा की चल प्रतिमा को परंपरागत रीति से हल्दी अर्पित की जाएगी। गौनहारिनों की टोली पारंपरिक मंगलगीत और सोहर गाकर पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देगी। लोकमान्यता के अनुसार गौरा काशी की बेटी हैं, इसलिए विवाहोपरांत गौने से पहले हल्दी की यह रस्म उसी आत्मीय भाव से निभाई जाती है, जैसे किसी घर की बेटी के साथ।

25 फरवरी को दोपहर 3 बजे बाबा की पारंपरिक पालकी का पूजन होगा। पालकी की सजावट और रंग-रोगन का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। सायंकाल 6:30 बजे माता गौरा का षोडशी श्रृंगार किया जाएगा। रेशमी वस्त्र, स्वर्णाभूषण, पुष्पमालाएं और चंदन-रोली से सुसज्जित स्वरूप श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्रस्तुत होगा। इन दिनों महंत आवास मायके के परिवेश में सजा है, जहां आंगन में मंडप, पारंपरिक अलंकरण और महिलाओं के गीत पूरे आयोजन को पारिवारिक रूप देते हैं।

26 फरवरी को सायं 6:30 बजे बाबा का प्रतीकात्मक आगमन गौरा-सदनिका में होगा। यह आयोजन उस लोकभाव को जीवंत करता है जब वर पक्ष दुल्हन को विदा कराने मायके पहुंचता है। इस अवसर पर बाबा को राजसी परिधान पहनाए जाएंगे और विशेष देव किरीट से अलंकृत किया जाएगा। काशी के पारंपरिक शिल्पियों द्वारा तैयार किए जा रहे वस्त्र और आभूषण इस उत्सव को सांस्कृतिक गहराई प्रदान करते हैं।

27 फरवरी को रंगभरी एकादशी का मुख्य आयोजन होगा। ब्रह्ममुहूर्त में विशेष पूजन के बाद सुबह श्रद्धालुओं के लिए दर्शन आरंभ होंगे। दोपहर में भोग आरती संपन्न होगी। सायं 5 बजे बाबा विश्वनाथ की पालकी मंदिर से प्रस्थान करेगी और निर्धारित मार्ग से नगर भ्रमण पर निकलेगी। मार्ग में श्रद्धालु अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से स्वागत करेंगे। यात्रा नवग्रह मंदिर, विश्वनाथ गली, साक्षी विनायक, ढुंढिराज गणेश और अन्नपूर्णा मंदिर होते हुए काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचेगी। शयन आरती के बाद पालकी पुनः महंत आवास लौट आएगी।

चार दिनों तक चलने वाला यह मांगलिक उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की जीवंत लोकपरंपरा का प्रतीक है। वेद मंत्रों, लोकगीतों और सामाजिक सहभागिता के साथ यह आयोजन नगर को एक सूत्र में पिरो देता है और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का संदेश देता है।

TOP

You cannot copy content of this page