मानव शरीर में सेंधमारी करता माइक्रोप्लास्टिक: पर्यावरण जन्य बनारस में बढ़ता एक अदृश्य खतरा

प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद बनारस में इसका खुलेआम उपयोग हो रहा है। इससे बनने वाला माइक्रोप्लास्टिक अब पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
प्लास्टिक आधुनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इसकी सस्ती कीमत और सुविधा के कारण इसका उपयोग हर जगह बढ़ा है। लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर प्लास्टिक जैव-अपघटनीय नहीं होता और लंबे समय तक प्रकृति में बना रहता है। समय के साथ यही प्लास्टिक टूटकर बहुत छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक ऐसे सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। ये कण बड़े प्लास्टिक सामान—जैसे पन्नी, पैकेजिंग सामग्री, बोतलें, कपड़े, टायर आदि—के टूटने से बनते हैं। कुछ माइक्रोप्लास्टिक पहले जानबूझकर बनाए जाते थे, जैसे सौंदर्य उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले माइक्रोबीड्स।

आज माइक्रोप्लास्टिक पानी, मिट्टी और हवा—तीनों में फैल चुके हैं।
अनुमानों के अनुसार वर्ष 2020 में लगभग 27 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में पहुँच चुका था, और यह मात्रा आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। चिंता की बात यह है कि ये कण हमारे भोजन और पानी के माध्यम से मानव शरीर में भी प्रवेश कर रहे हैं।

भारत सरकार ने एकल-उपयोग प्लास्टिक को समाप्त करने के लिए प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2021 लागू किए। उत्तर प्रदेश भी पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने वाले राज्यों में शामिल है। इसके बावजूद ज़मीनी स्तर पर इन नियमों का पालन पूरी तरह नहीं हो पा रहा है।

लंका क्षेत्र और बनारस के घाटों के आसपास किए गए क्षेत्रीय अवलोकन बताते हैं कि प्लास्टिक का दुरुपयोग आज भी आम है। सड़क किनारे ठेले और दुकानों पर समोसे, चाय, नाश्ता और मिठाइयाँ अक्सर पतली और निम्न-गुणवत्ता वाली प्लास्टिक शीट में दी जाती हैं, जो न तो खाद्य-सुरक्षित होती हैं और न ही कानूनी रूप से मान्य। उपयोग के बाद यह प्लास्टिक सड़कों पर फेंक दिया जाता है या नालियों के माध्यम से गंगा नदी तक पहुँच जाता है। धूप, गर्मी और बार-बार उपयोग से यह प्लास्टिक तेजी से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जिससे पानी, मिट्टी और भोजन प्रदूषित होते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।

शोधों में माइक्रोप्लास्टिक चाय, शहद, चीनी, फल-सब्ज़ियों और मछलियों में पाया गया है। ये कण जहरीले रसायनों और भारी धातुओं को अपने साथ लेकर चलते हैं और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक से आंतों में सूजन, लीवर से जुड़ी समस्याएँ और कोशिकीय क्षति हो सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

समाधान क्या हो सकते हैं?

प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। प्लास्टिक और नॉन-स्टिक बर्तनों के उपयोग से बचना चाहिए

तथा प्राकृतिक रेशों से बने कपड़े अपनाने चाहिए।

प्लास्टिक के दुष्प्रभावों को लेकर जन-जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।

साथ ही प्लास्टिक प्रतिबंध से जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन और निगरानी सुनिश्चित करनी होगी।

स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए कागज़, कपड़े या जैव-अपघटनीय पैकेजिंग को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।

यदि आज प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो माइक्रोप्लास्टिक आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गंभीर और अदृश्य स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

यह गम्भीर विषय सुश्री अंजू जांगिड़ , शोध छात्रा , रस शास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग, आयुर्वेद संकाय, चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोध विषय ” उत्तरी भारत में आयुर्वेद स्वास्थ्य एवं वेलनेस पर्यटन की व्यावहारिक संभावनाओं का व्यापक अध्ययन” में सामने आयी हैं ।

अंजू जांगिड़ ने अपने अध्ययन सर्वे में वाराणसी के टूरिस्ट प्लेस, घाट और प्रसिद्ध खान पान की दुकानों के व्यवस्था का अध्ययन कर, इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं।

प्रोफेसर आनन्द चौधरी के पर्यवेक्षण में यह शोध कार्य अंजू जांगिड़ कर रही हैं। प्रोफेसर चौधरी ने अंजू जांगिड़ के शोध परिणामों पर जो कि माइक्रोप्लास्टिक से उत्पन्न स्वास्थ्य विकार की ओर इंगित कर रहे हैं, चिन्ता व्यक्त की है।

आपने कहा कि स्वस्थ दिनचर्या का पालन करके ही माइक्रोप्लास्टिक के विकारों से बचा जा सकता है।

साथ ही साथ प्लास्टिक के उपयोग को रोकने हेतु जागरूकता की भी अनिवार्य आवश्यकता है।

आनन्द चौधरी

रस शास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग आयुर्वेद संकाय चिकित्सा विज्ञान संस्थान

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