महाकुंभ में समता, सेवा और सहजता की त्रिवेणी: निर्मल अखाड़े का भव्य छावनी प्रवेश

महाकुंभ क्षेत्र में सजी आध्यात्मिक नगरी, सिख समुदाय के निर्मल अखाड़े का अद्भुत प्रवेश

महा कुंभ नगर, 11 जनवरी। आस्था और अध्यात्म का महासंगम महाकुंभ अब पूर्ण रूप से सज चुका है। सनातन धर्म के शैव, वैष्णव और उदासीन अखाड़ों के बाद श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल ने भी अपने छावनी क्षेत्र में प्रवेश किया। हजारों संतों और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में यह छावनी प्रवेश यात्रा भव्यता और दिव्यता की अद्भुत मिसाल बनी।

वेद, वेदांग और गुरुवाणी का त्रिवेणी संगम

श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल की छावनी प्रवेश यात्रा में आध्यात्मिकता की त्रिवेणी प्रवाहित हुई। वेद, वेदांग और गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी ने इस यात्रा को पवित्रता और शांति का स्वरूप दिया। कीडगंज स्थित अखाड़े के मुख्यालय से निकली इस यात्रा में संतों का समूह रथ, बग्घी और घोड़ों पर सवार होकर निकला। यात्रा में सबसे आगे गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी थी, जिसके पीछे तलवार लिए पंच प्यारे चल रहे थे।

यात्रा में करीब एक हजार संतों ने हिस्सा लिया, जिनमें अधिकांश सिक्ख समुदाय से थे। महिलाओं ने गुरुवाणी का पाठ और शबद कीर्तन करते हुए इस यात्रा को और अधिक भक्तिमय बनाया। मां काली के रौद्र रूप को प्रदर्शित करने वाली झांकी ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया और कौतुहल का विषय बनी।

दिव्य और भव्य महाकुंभ की झलक

सनातन धर्म के अखाड़ों में जहां वैभव और भव्यता प्रमुख होती है, वहीं निर्मल अखाड़ा अपनी समता, सेवा और सहजता के लिए जाना जाता है। दस सिख गुरुओं द्वारा सिखाए गए सेवा और भक्ति के सिद्धांत इस यात्रा में स्पष्ट रूप से झलके। गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी और पंच प्यारों के साथ सिक्ख समुदाय के सैकड़ों सेवादार यात्रा के मार्ग को साफ करते और झाड़ू लगाते नजर आए। यह दृश्य महाकुंभ में स्वच्छता और सेवा का अनुपम उदाहरण बना।

पुष्प वर्षा और स्वागत का उत्साह

यात्रा मार्ग पर विभिन्न स्थानों पर स्थानीय लोगों ने पुष्प वर्षा कर संतों और श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत किया। मां काली की झांकी और गुरुवाणी के पाठ से मार्ग आध्यात्मिकता से भर उठा। यह छावनी प्रवेश न केवल निर्मल अखाड़े की आध्यात्मिकता को दर्शाता है, बल्कि योगी सरकार के स्वच्छ और दिव्य महाकुंभ के उद्देश्य को भी साकार करता है।

सेवा और भक्ति का संदेश

निर्मल अखाड़े की छावनी प्रवेश यात्रा महाकुंभ की आध्यात्मिकता का प्रतीक बनी। इस यात्रा ने जहां धार्मिक मूल्यों और परंपराओं का अनुसरण किया, वहीं सेवा और भक्ति का संदेश भी दिया। यह यात्रा महाकुंभ के दिव्य और भव्य स्वरूप को और भी अधिक गरिमा प्रदान करती है।

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